Sunday, June 25, 2017

जब वाजपेयी ने कलाम से कहा- केवल हां चाहिए, न नहीं


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दफ़्तर में विशेष अधिकारी रहे दुलत के मुताबिक 2002 में फ़ारूक़ अब्दुल्ला को उपराष्ट्रपति और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाने की योजना चल रही थी. यह प्रस्ताव राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्र ने प्रधानमंत्री वाजपेयी की तरफ़ से फ़ारूक़ अब्दुल्ला के सामने तब रखा था जब वह दुलत के घर पर डिनर कर रहे थे. इसके बाद वाजपेयी और आडवाणी ने भी इस सिलसिले में फ़ारूक़ अब्दुल्ला से बात की थी. वाजपेयी का इरादा था फ़ारूक को दिल्ली लाना ताकि वह फिर से मुख्यमंत्री नहीं बन पाएं और उमर भी इससे ख़ुश रहें.
यह प्रस्ताव फ़ारूक़ को तब दिया गया जब लगा कि तब के उपराष्ट्रपति कृष्णकांत 11वें राष्ट्रपति बन जाएंगे. लेकिन बाद में आडवाणी ने कृष्णकांत को राष्ट्रपति बनाने के प्रस्ताव का विरोध किया. फ़ारूक़ को दिल्ली में बैठी एनडीए सरकार पर भरोसा नहीं था कि वे अपना वादा पूरा करेंगे. उनकी शंका सच भी साबित हुई. फ़ारूक़ को लेकर एनडीए में माना गया कि वह एक गंभीर शख़्स नहीं हैं. ख़ास तौर से संघ परिवार को उनका नाम पसंद नहीं आया. फिर फ़ारूक को दिल्ली में कैबिनेट मंत्री बनाने की बात भी हुई, लेकिन वह भी नहीं हो पाया. 

उधर एपीजे अब्दुल कलाम चेन्नई की अन्ना यूनिवर्सिटी में 10 जून 2002 को 'विज़न टू मिशन' पर अपना नौवां लेक्चर दे रहे थे. जब वह शाम को लौटे तो अन्ना यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर ए कलानिधि ने उनसे कहा कि उनके दफ़्तर में लगातार आपसे बात करने के लिए फ़ोन आ रहे थे. जब कलाम अपने कमरे में पहुंचे तब भी फ़ोन की घंटी बज रही थी. उन्होंने फ़ोन उठाया तो आवाज़ आई, "प्रधानमंत्री आपसे बात करना चाहते हैं." जब तक प्रधानमंत्री फ़ोन पर आते तब तक कलाम के मोबाइल पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का फ़ोन आ चुका था. नायडू ने कहा कि पीएम का आपके पास एक इंपॉर्टेंट कॉल आने वाला है. प्लीज़ ना मत कहिएगा. इतनी ही देर में दूसरे फ़ोन पर वाजपेयी की आवाज़ सुनाई दी.

वाजपेयी ने पूछा, "कलाम साहब, आपका काम कैसा चल रहा है?" जवाब मिला, "बहुत बढ़िया. फैंटास्टिक." वाजपेयी ने कहा, "मेरे पास आपके लिए एक बड़ी अहम ख़बर है. अभी मैं एनडीए में सहयोगी दलों की बैठक से आ रहा हूं और हमने सर्वसम्मति से तय किया है कि देश आपको राष्ट्रपति के तौर पर चाहता है. आपकी सहमति चाहिए. मुझे रात को इसका एलान करना है, मुझे केवल हां चाहिए, न नहीं." 

कलाम ने कहा, "वाजपेयी जी मुझे दो घंटे का वक़्त दीजिए. इसके साथ ही राष्ट्रपति चुनाव के लिए दूसरे राजनीतिक दलों की सहमति भी चाहिए होगी." वाजपेयी ने कहा, "आपके तैयार होने के बाद हम सबसे सहमति बनाने पर काम करेंगे."
दो घंटे बाद कलाम ने फ़ोन किया, "वाजपेयी जी मुझे यह बहुत महत्वपूर्ण मिशन लगता है, लेकिन मैं सभी पार्टियों की तरफ़ से उम्मीदवार बनना चाहता हूं." वाजपेयी ने कहा कि हम इस पर काम करेंगे.
पंद्रह मिनट में यह ख़बर देश भर में आग की तरह फैल गई. वाजपेयी ने उसी दिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को फ़ोन किया. सोनिया गांधी ने वाजपेयी से पूछा कि क्या एनडीए में इस पर फ़ैसला हो गया है? वाजपेयी ने हां कहा. सोनिया गांधी ने कांग्रेस और अपने सहयोगी दलों से सलाह-मशविरा के बाद 17 जून 2002 को कलाम को समर्थन देने का एलान किया. सिर्फ़ लेफ़्ट पार्टियों ने अपना उम्मीदवार अलग से खड़ा करने की बात की. अगले दिन के अख़बारों और न्यूज़ चैनलों पर सिर्फ़ यही ख़बर थी और बहुत सारे सवाल भी थे, कि क्या एक ग़ैर-राजनीतिक शख़्सियत राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारी को संभाल पाएगी? 
तब बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता माने जाने वाले प्रमोद महाजन को कलाम का इलेक्शन एजेंट बनाया गया और कलाम के दिल्ली में एशियाड गांव के फ़्लैट नं. 833 को कैम्प ऑफिस में तब्दील कर दिया गया. प्रमोद महाजन ने कलाम को सभी सांसदों को एक चिट्ठी लिखने को कहा जिसमें कलाम अपने विचार और योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी देते. ये चिट्ठी दोनों सदनों के तकरीबन 800 सांसदों को भेजी गई और कलाम भारी बहुमत से 18 जुलाई 2002 को राष्ट्रपति चुन लिए गए. 25 जुलाई को जब कलाम संसद के खचाखच भरे सेंट्रल हॉल में शपथ ले रहे थे तब सभी विशिष्ट अतिथियों के साथ-साथ देश भर से आए सौ बच्चे भी इस समारोह के ख़ास मेहमान थे. शायद पहली बार देश को एक ऐसा राष्ट्रपति मिला, जिसने राष्ट्रपति भवन के दरवाज़े आम आदमी के लिए खोल दिए. सही मायनों में आम आदमी का ख़ास राष्ट्रपति! 
(आभार: हार नहीं मानूंगा एक अटल जीवन गाथा, लेखक: विजय त्रिवेदी, प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया.)


Saturday, September 5, 2015

अतीत का आईना...

रज़िया फंस गई गुंडों में...ये जुमला तो आपको याद ही होगा...यादों के कारवां में आज बात ऐसी रज़िया की होगी, जो गुंडों के बीच नहीं फंसी...बल्कि निहायत ही शरीफ़ और मिलनसार लोगों के बीच फंसी थी...शायद रज़िया को फंसने जैसा एहसास भी नहीं था, वो तो उन चार लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बनकर बेहद ख़ुश थी...ख़ुद की क़िस्मत पर इतरा रही थी...और रज़िया की शान में चार चांद लगाने के लिए ये चार शख़्स दिलो-जां से हाज़िर रहते थे...रज़िया के रखवालों को भी ये पता था कि उनका गुलशन इन्हीं चार की बदौलत आबाद रहता है...अब आप कहेंगे कि इस तस्वीर का रज़िया से क्या ताल्लुक...जनाब निज़ाम के शहर में जब नवाबों के शहर की तहजीब और तमीज़ की आमद हुई, तो ऐसी बहुत सी तस्वीरों की गवाह रज़िया बनी...चलिए अब सस्पेंस को ख़त्म किया जाए...हम बात कर रहे हैं रज़िया कॉटेज की...पूरा पता- C/O, मोहम्मद इदरीस शरीफ़, प्लॉट नंबर- A-209, हिल कॉलोनी, निकट वैलेंटाइन बेकरी, वनस्थलीपुरम्, ज़िला- रंगारेड्डी (आंध्र प्रदेश)...जी हां रामोजी फ़िल्म सिटी में काम करते वक़्त आख़िरी दो साल यही मेरा स्थानीय पता था...हालांकि सुजीत श्रीवास्तव, रामगोपाल द्विवेदी और आशीष निगम रज़िया के पुराने आशिक़ थे...कहने का मतलब कि मुझसे 8 महीने पहले से रज़िया कॉटेज ही उनका डेरा और बसेरा था...जनवरी 2009 में मुझे रज़िया की खिदमत में पेश होने का प्रस्ताव मिला, जिसे में इनकार न कर सका और इन तीनों साथियों के साथ रज़िया का हमसफ़र बन गया...हमारी ज़रूरतों ने रज़िया की अहमियत बढ़ा दी...धीरे-धीरे वो ईटीवी में काम कर रहे हमारे तमाम साथियों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में रच-बस गई...हमारे लिए रज़िया सुबह-ए-बनारस भी थी और शाम-ए-अवध भी...रज़िया बहुत सारे इकरार की गवाह बनी और कई बार तक़रार को भी बख़ूबी झेला...रज़िया के जीवन में तीन और शख़्स भी इस दौरान आए, हालांकि उनका ये मिलन कम वक़्त का मेहमान रहा...यूपी डेस्क के विक्रम मिश्रा, विश्वनाथ जी और ग्राफिक डिजायनर अजीत ने भी कुछ अरसे के लिए रज़िया की रौनक बढ़ाई...वैसे रज़िया तो हमारे सभी साथियों के लिए पलक-पांवड़े बिछाए तैयार रहती थी...कहने के लिए तो हम चार लोग ही रज़िया कॉटेज की ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे...लेकिन आस-पड़ोस के लोगों को भी शायद ये पता नहीं चल पाता था कि वाकई में कितने लोग रज़िया के दिल में बसते हैं...रज़िया हर किसी को आसानी से ख़ुद में समेट लेती थी...उसके संस्कार ही कुछ ऐसे थे...नीचे हवन का धुआं उठता था और ऊपर क़ुरान की पवित्र आयतों की आवाज़ फ़िज़ा को पाक बना देती थी...वहां ईद की सिंवइयों की मिठास भी थी और होली की गुझिया का स्वाद भी...रज़िया की ये समाजिक और सांस्कृतिक विरासत हमारे लिए हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे बड़ी प्रतीक जैसी थी...वैसे तो रज़िया के रखवाले (मकान मालिक) इदरीस भाई थे, लेकिन भरोसा ऐसा था कि कभी ज़रूरत पड़ी, तो रज़िया को हमारे हवाले करने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं किया...रज़िया ने बहुत सारी दावतों की भी मेजबानी की... शायद ही कोई दिन ऐसा था जब हमने चार लोगों के लिए खाना बनाया...अगर बना भी तो उसमें हिस्सेदारी करने वालों की संख्या चार से ज़्यादा ही रही...चाय तो रज़िया के यहां सबसे बड़े रिवाज़ में शामिल थी...इस तस्वीर में दिख रहे अग्निवेश शर्मा, सत्येंद्र यादव और अमित सिंह विराट भी एक शाम चाय की इसी रवायत का हिस्सा बने...2010 में ईटीवी को अलविदा कहते वक़्त रज़िया से दूर होना मजबूरी थी... लेकिन आज भी यादों के आईने में जब वनस्थलीपुरम् के इस आशियाने की तस्वीर देखता हूं, तो लगता है कि रज़िया से रिश्ता बहुत पुराना है...

अतीत का आईना...

मान्यताओं के मुताबिक शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हैदराबाद के पास करनूल ज़िले में स्थित है...उत्तर में ज़्यादातर लोग इसे मल्लिकार्जुन के नाम से जानते हैं, लेकिन अगर आपने हैदराबाद में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग जाने का रास्ता पूछा, तो आपको शायद ही कोई बता पाए...आंध्र प्रदेश में महादेव की ये स्थली श्रीशैलम् के नाम से मशहूर है...हैदराबाद से तक़रीबन 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्रीशैलम् बेहद ख़ूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य की विलक्षण अनुभूति का केंद्र है...हैदराबाद से यहां पहुंचने में क़रीब 5 घंटे लगते हैं...आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का दौरा करने के बाद शिवानंद लहरी की रचना की...हैदराबाद से श्रीशैलम् तक का सफ़र अविस्मरणीय रोमांच से भरपूर है...नल्ला-मल्ला जंगल को पार करते हुए यहां का रास्ता तय किया जाता है...इसके बाद जगह-जगह आपको कृष्णा नदी घाटी का विहंगम नज़ारा देखने को मिलेगा...श्रीशैलम् में कृष्णा नदी को पातालगंगा के नाम से जाना जाता है...ऐसे ही एक रोमांचक सफ़र पर मैं भी निकला था...श्रीशैलम् जाने का दो बार मौक़ा मिला...संयोग की बात ये रही कि दोनों बार सावन महीने में भोले बाबा की चौखट पर पहुंचा...श्रीशैलम् की यात्रा में एक बड़ा आकर्षण का केंद्र श्रीशैलम् पावर प्रोजेक्ट भी है...पूरे सफ़र में आपको प्रकृति के ऐसे मनोरम नज़ारे दिखेंगे, जो आप भुला नहीं पाएंगे...उत्तर का कैलाश तो नहीं देखा, लेकिन दक्षिण के कैलाश यानी श्रीशैलम् को देखा और महसूस किया...वाकई ये ऐसी अनोखी जगह है, जहां एक बार पहुंचने के बाद आप बार-बार जाने की हसरत रखेंगे...

अतीत का आईना...

रामोजी फ़िल्म सिटी में एक बड़ा आकर्षण फ़िल्मों की शूटिंग को लेकर होता था...कभी रात में शूटिंग का मज़ा लीजिए, कभी दिन में...एक दिन मैं भी इसी उत्साह में ईटीवी बिल्डिंग के पीछे बने एयरपोर्ट के सेट के पास पहुंच गया...पता चला कि रोहित शेट्टी की फ़िल्म ऑल द बेस्ट के गाने की शूटिंग चल रही है...अब भला संजू बाबा को क़रीब से देखने का मौक़ा कैसे गंवाता...लिहाजा मैं भी दर्शक दीर्घा का हिस्सा बनने पहुंच गया...ये फोटो मैंने अपने मोबाइल से ली थी, वो भी बड़े दिलचस्प तरीक़े से...दरअसल तस्वीर में जो कैमरा दिख रहा है, इसको ज़ूम चैनल के कैमरामैन संभाल रहे थे...मैंने भी बग़ैर देरी किए कैमरामैन के कंधे पर हाथ रखकर फोटो खींच ली...तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि अगर प्रबंधन को पता चल गया कि आप शूटिंग देखने में मशगूल हैं, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी सामना करना पड़ सकता था...लेकिन ज़्यादातर साथी इसकी परवाह नहीं करते थे...एक और बात फ़िल्म सिटी के ज़्यादातर लोकेशन ईटीवी में काम करने वाले लोग आसानी से पहचान लेते हैं...क्योंकि बहुत सारे लोकेशन तो रोज़ बस से फिल्म सिटी में प्रवेश करते ही दिख जाते थे...ऐसे में बॉलीवुड हो या टॉलीवुड की फ़िल्म, सीन देखते ही ज़्यादातर साथी भांप जाएंगे कि सहारा के पास कौन सी शूटिंग हुई और तारा-सितारा पर किसकी...एक और दिलचस्प वाकया सरकार राज फिल्म को देखते वक्त हुआ...मूवी में एक जगह अभिषेक बच्चन प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, लेकिन सारी चैनल आईडी एक ही चैनल यानी ईनाडु की थीं...हॉल का नाम भी बता देता हूं, वही अपना सुषमा सिनेमा हॉल...ख़ास बात ये थी कि फ़िल्म देखने वाले ज़्यादातर लोग भी वहां ईटीवी से ही आए थे...सुषमा अब भी रामोजी फ़िल्म सिटी के लोगों का मनोरंजन केंद्र बना हुआ है...

Sunday, September 1, 2013

सत्याग्रह या दुराग्रह ???

रियल लाइफ़ को रील लाइफ़ से जोड़कर डायरेक्टर प्रकाश झा अक्सर अपनी फ़िल्मों में सामाजिक मुद्दों को उठाने में कामयाब रहे हैं. हालिया रिलीज फ़िल्म सत्याग्रह भी इसी कड़ी का हिस्सा है. हालांकि सत्याग्रह की स्क्रिप्ट में थोड़ा सा ट्विस्ट है.

कहानी के पीछे की कहानी

इस फिल्म में दो अलग-अलग घटनाक्रमों को फ़िल्म के पैमाने में फिट बैठाने की कोशिश की गई है. राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में इंजीनियर रहे सत्येंद्र दुबे हत्याकांड की यादें अब भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं. वही ईमानदार इंजीनियर सत्येंद्र दुबे जिन्होंने तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर NHAI में चल रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश की थी. लेकिन 27 नवंबर 2003 को पटना के सर्किट हाउस में उनकी हत्या हो गई...

कहानी कुछ ज्यादा ही प्रेडिक्टेबल
                                       
सत्याग्रह की शुरुआती कहानी भी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है. फिल्म में अंबिकापुर के आदर्शवादी पूर्व प्रिंसिपल द्वारका आनंद (अमिताभ बच्चन) के इंजीनियर बेटे अखिलेश (इंद्रनील सेन गुप्ता) की मौत भी ऐसे ही मिलते-जुलते हालात में होती है. लेकिन बेटे की मौत पर मुआवज़े के लिए चक्कर काट रहे द्वारका बाबू जैसे ही अंबिकापुर के डीएम को थप्पड़ मारते हैं, इसमें अन्ना आंदोलन की खिचड़ी भी पकने लगती है. द्वारका बाबू के जेल जाने की ख़बर से उनके बेटे का जिगरी दोस्त मानव राघवेंद्र (अजय देवगन) भी भ्रष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह में कूद पड़ता है...इस लड़ाई में द्वारका बाबू के पास आदर्श हैं, तो दूसरी तरफ़ मानव सोशल मीडिया और प्रैक्टिकल सोच वाला आदमी है. इन दोनों का मेल सत्याग्रह को धार देता है. जिससे इलाके के नेता और गृह मंत्री बलराम सिंह (मनोज वाजपेयी) की कुर्सी हिल जाती हैं. हालांकि मानव ख़ुद भी कारोबारी है, और भ्रष्टाचार में लिप्त था, लेकिन दादू जी यानी द्वारका बाबू का नेक मकसद उसे भी बदल देता है...

सत्याग्रह की मुहिम में युवा नेता अर्जुन रघुवंश (अर्जुन रामपाल) और ख़बरिया चैनल की पत्रकार यास्मीन (करीना कपूर) भी जुड़ जाती हैं. फ़िल्म की स्क्रिप्ट में आगे वही सारी चीज़ें दिखती हैं, जो अगस्त 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान में दिखी थीं. सत्याग्रह की लंबी लड़ाई का अंत राजनीतिक पार्टी के गठन से होता है, जिसमें दादू जी को जान की कुर्बानी देनी पड़ती है...

फिल्म की कहानी कहां हाथ से निकली?

प्रकाश झा की फ़िल्म को देखने के लिए जिस सोच के साथ सिनेप्रेमी जाता है, उस लिहाज से तो सत्याग्रह निराश करती है. मसलन एक मौके पर द्वारका बाबू अमर रहें के नारे लगते दिखते हैं. जबकि वो अनशन के मंच पर जीवित बैठे हैं. सत्याग्रह के आख़िर में इतनी हिंसा भी बेतुकी लगती है. ख़ास तौर से जिन लोगों ने अन्ना आंदोलन के दौरान भीड़ का अनुशासित प्रदर्शन देखा है, उन्हें ये आसानी से नहीं पचेगी. 

कौन सा क़िरदार रहा कमज़ोर?
 

अमिताभ का रोल तो मज़बूत है, लेकिन कई मौक़ों पर मामला ओवरडोज़ का हो जाता है. अजय देवगन जंचते तो हैं, लेकिन 6 हज़ार 317 करोड़ का बिजनेस छोड़कर सत्याग्रह के लिए अचानक धूल फांकना भी अजीब लगता है. करीना भी ग्राउंड ज़ीरो के पत्रकार से ज़्यादा मॉडल नज़र आती हैं. अर्जुन रामपाल भी फिलर के तौर पर काम करते दिखे...

मज़बूत पक्ष की बात करें तो फ़िल्म में बाज़ी मारी है बलराम सिंह यानी मनोज वाजपेयी ने. उनकी संवाद अदायगी और अदा वैसी ही है, जिसके लिए वो जाने जाते हैं. शुरू से आख़िर तक दर्शकों की सबसे ज़्यादा ताली उन्हीं को मिली. द्वारका बाबू की विधवा बहू सुमित्रा यानी अमृता राव ने ज़रूर छाप छोड़ी है. अजय-करीना का रोमांटिक सॉन्ग बेतुका तो है, लेकिन बनारस घराने के छन्नू लाल मिश्र के बोल लाजवाब हैं. मेरी निगाह में गंगाजल और अपहरण के बाद प्रकाश झा कमबैक नहीं कर पाए हैं. राजनीति और आरक्षण के बाद अब सत्याग्रह भी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती दिखती है. कम से कम प्रकाश झा के प्रशंसकों को इस फ़िल्म से कोई उम्मीद पालने की ज़रूरत नहीं है...

संप्रति- 
सुधाकर सिंह,
टीवी पत्रकार
मोबाइल- 8860764647
 

Monday, December 26, 2011

राजनीति के अजातशत्रु



धरती को बौने नहीं ऊंचे कद के इंसानों की ज़रूरत है...
लेकिन इतने ऊंचे भी नहीं कि कहीं कोई दूब न जमे...
कोई कांटा न चुभे...मेरे प्रभु मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना...
ग़ैरों को गले न लगा सकूं...ऐसी रुखाई कभी मत देना...
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति के भीष्म पितामह हैं...और मैं उनसे अपील करता हूं कि वो न्यूक्लियर डील के समर्थन में आगे आएं...2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर लेफ्ट का विरोध झेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बीजेपी से सहयोग मांगते हुए ये अपील की थी... दरअसल वाजपेयी सियासत में आम सहमति के अटल पैरोकार रहे हैं...यही वजह है कि कभी उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र 51 और 49 का खेल नहीं है...2002 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने जिस तरह सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और अर्जुन सिंह के साथ बैठक कर डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर आम सहमति बनाई...वो सहमति की सियासत की बेहतरीन मिसाल है...
जन्म- 25 दिसंबर 1924
जन्म स्थान- ग्वालियर(मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी की शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हुई...जबकि आगे की पढ़ाई उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज सेकी...कॉलेज जीवन से ही वाजपेयी को कविता लिखने का शौक था...जो आगे भी जारी रहा...
आओ फिर से दिया जलाएं...
हम पड़ाव को समझें मंज़िल...
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल...
वर्तमान के मोहजाल में...
आने वाला कल न भुलाएं...
आओ फिर से दिया जलाएं...
1957 में पहली बार वो जनसंघ उम्मीदवार के रूप में यूपी की बलरामपुर सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे...संसद में अटल ने अपनी पहचान एक कुशल वक्ता के रूप में बनाई...कश्मीर मुद्दे पर बेबाक राय रखते हुए उन्होंने कहा कि कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजना ऐतिहासिक भूल थी...उनकी भाषण शैली से प्रभावित होकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कहा था कि एक दिन ये युवक भारत का प्रधानमंत्री बनेगा...
आपातकाल के बाद जब मोरारजी देसाई की अगुवाई में सरकार बनी..तो वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया...4 अक्टूबर 1977 को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में यादगार भाषण दिया...इससे पहले देश के किसी नागरिक ने हिंदी का इस्तेमाल इस मंच से नहीं किया था...1980 में भारतीय जनसंघ के नए स्वरूप भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ...और वाजपेयी इसके संस्थापक सदस्यों में से एक रहे... वाजपेयी लगातार 4 बार लखनऊ से सांसद रहे...और वो लोकसभा के इकलौते सदस्य हैं...जो 4 अलग-अलग राज्यों यूपी, एमपी, गुजरात और दिल्ली से चुने जा चुके हैं...1996 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी...तो 21 मई को वो पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने...हालांकि ये कार्यकाल 13 दिन का ही था…. मार्च 1998 में अटलजी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्रीबने...दूसरे कार्यकाल में उन्होंने विज्ञान और तकनीक की प्रगति के साथ देश के भविष्य को जोड़ा...11 और 13 मई 1998 को पोकरण में परमाणु परीक्षण के ज़रिए देश एटमी पावर से लैस बन गया...प्रतिबंधों की परवाह किए बिना वाजपेयी ने जय जवान, जय किसान के नारे में जय विज्ञान को जोड़ते हुए अमेरिका को भी चौंका दिया...हालांकि वो परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के हमेशा ख़िलाफ़ रहे...हिरोशिमा की पीड़ा नाम से लिखी कविता में वाजपेयी ने अपना दर्द बयां किया है...
किसी रात को मेरी नींद अचानक उचट जाती है...
आंख खुल जाती है...मैं सोचने लगता हूं कि...
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का आविष्कार किया था...
वे हिरोशिमा-नगासाकी के भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर...
रात को कैसे सोए होंगे?
पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में फरवरी 1999 में उनकी बस यात्रा के क़दम की काफ़ी प्रशंसा हुई...हालांकि बाद में करगिल युद्ध से दोनों देशों के संबंध बिगड़ गए...करगिल युद्ध के बाद हुए आम चुनाव में एक बार फिर एनडीए की सरकार बनी और वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने...पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य बनाने के लिए उन्होंने लगातार पहल की...2001 में पाकिस्तान के सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ को शिखर वार्ता के लिए वाजपेयी ने आगरा बुलाया...अपने कार्यकाल में उन्होंने आर्थिक सुधारों की नीति जारी रखी… देश के शहरों को सड़कों से जोड़ने के लिए बनी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उन्हीं की देन है...2004 के चुनाव में शाइनिंग इंडिया और इंडिया राइजिंग का नारा देते हुए एनडीए ने अक्टूबर के बजाए अप्रैल में चुनाव करा लिए..लेकिनपार्टी सत्ता में नहीं लौट सकी... ख़राब स्वास्थ्य के चलते वाजपेयी सक्रिय राजनीति से पिछले कई साल से दूर हैं... इसके बावजूद वो सियासत में शुचिता की परंपरा के  भीष्म पितामह हैं...
टूटे हुए सपने की कौन सुने सिसकी...
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी...
हार नहीं मानूंगा…रार नई ठानूंगा...
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं...
गीत नया गाता हूं... गीत नया गाता हूं..

दमदार अदम को सलाम...







खिले हैं फूल कटी छातियों की धरती पर...फिर मेरे गीत में मासूमियत कहां होगी...आप आएं तो कभी गांव की चौपालों में...मैं रहूं या न रहूं भूख मेजबां होगी...भूख और ग़रीबी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले मशहूर शायर अदम गोंडवी नहीं रहे...अदम ने लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई अस्पताल में अंतिम सांस ली...64 साल के अदम क्रॉनिक लिवर डिजीज से पीड़ित थे....
जो घर के ठंडे चूल्हे पर फकत खाली पतीली है...
बताओ कैसे लिख दूं...धूप फागुन की नशीली है...
मुशायरों में सिकुड़ा कुर्ता-धोती और गले में सफ़ेद गमछा डाले अदम जब गंवई अंदाज़ में पहुंचते थे....तो लोग बहुत ध्यान नहीं देते थे...लेकिन जब वो ग़ज़ल कविता सुनाते तो लोग हैरान रह जाते थे...
जन्म- 22अक्टूबर 1947
जन्म स्थान- आटा परसपुर, गोंडा (उत्तर प्रदेश)
असली नाम- रामनाथ सिंह
आज़ाद हिंदुस्तान और अदम की उम्र एक है...साहित्य की दुनिया में अदम गोंडवी के नाम से मशहूर रामनाथ सिंह का जन्म यूपी के गोंडा ज़िले में हुआ था...अदम ने हमेशा समाज के दबे-कुचले और कमज़ोर तबके की आवाज़ उठाई...'धरती की सतह पर' और 'समय से मुठभेड़' जैसे ग़ज़ल संग्रह से उन्होंने ख़ूब नाम कमाया...मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें 1998 में दुष्यंत कुमार पुरस्कार से नवाज़ा...अदम ने अपनी क़लम के ज़रिए हमेशा समाज की तल्ख सच्चाई को सामने रखा...
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे...
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे...
अदम उस पंक्ति के शायर हैं...जिनकी शायरी आपको परेशान, बेचैन और विचलित करती है...और सुनने वालों के सामने सवाल बनकर खड़ी हो जाती है...
जो उलझ कर रह गई है फ़ाइलों के जाल में...
गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में...
अदम सियासी हालात को ग़ज़ल के ताने-बाने पर चढ़ाकर अनुभव का हिस्सा बना देते हैं...
काजू भुनी प्लेट में व्हिस्की गिलास में...
उतरा है रामराज विधायक निवास में...
आज़ादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह...
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में...
जितनी मानवीय संवेदना और दर्द अदम की शायरी में है..उससे कहीं ज़्यादा संवेदनहीनता उनके साथ बरती गई...मरते दम तक हिंदी संस्थान और उर्दू अकादमी ने उनकी कोई सुध नहीं ली...अदम के सवाल अब भी बने हुए हैं....और उनकी मौत संवेदनहीन सिस्टम पर एक बार फिर सवाल खड़े कर गई...फटे कपड़ों में तन ढांके गुज़रता हो जिधर कोई...समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है...जनकवि अदम गोंडवी को भावभीनी श्रद्धांजलि...

Thursday, November 24, 2011

एक थप्पड़...जनता के नाम...

(दिल्ली में आज एक कार्यक्रम के दौरान बढ़ती महंगाई से गुस्साए एक शख्स ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ जड़ दिया...पवार इफको के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने एनडीएमसी सेंटर पहुंचे थे....तभी हरविंदर सिंह नाम के शख्स ने पवार को थप्पड़ रसीद कर दिया...इस हमले से एक बार फिर साफ़ हो गया कि महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता का ग़ुस्सा बर्दाश्त से बाहर हो चुका है...)
एक थप्पड़...महंगाई के नाम...एक थप्पड़...उन किसानों के नाम....जो क़र्ज़ के बोझ तले ख़ुदकुशी करने पर मजबूर हो गए...एक थप्पड़...उस मजबूर जनता के नाम...जिसकी सुनने वाला कोई नहीं...एक थप्पड़ उस भ्रष्टाचार के नाम...जिसकी जड़ें सिस्टम में गहरे से पैठ कर चुकी हैं...दरअसल ये थप्पड़ उस अवाम के ग़ुस्से का इज़हार है...जो नेताओं के शह और मात के खेल में ख़ुद को ठगा महसूस कर रही है...ये थप्पड़ महंगाई के नाम इसलिए है क्योंकि इसको रोकने की कोई कोशिश रंग लाती नहीं दिख रही है...हर बार एक नई तारीख़ दे दी जाती है...इस बार वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मार्च का महीना मुकर्रर किया है...ये थप्पड़ किसानों के नाम इसलिए है...क्योंकि उनको फसल की वाजिब क़ीमत नहीं मिल रही है...महाराष्ट्र में कपास के समर्थन मूल्य पर कोहराम मचा है...लेकिन किसानों की सुनता ही कौन है...किसानों का कब्रिस्तान बन चुका है विदर्भ...इस साल के पहले 6 महीनों में वहां 79 किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली...जबकि 2010 में 275 और 2009 में 263 किसानों ने क़र्ज़ के बोझ तले जान दे दी...ये थप्पड़ मजबूर जनता के नाम इसलिए है...क्योंकि महंगाई और भ्रष्टाचार पर न तो कोई रोक लग रही है...और न ही कोई इस पर साफ़-साफ़ बोलने को तैयार है...हिंदुस्तान की अवाम सियासत से कितनी तंग आ चुकी है...उसकी नज़ीर है ये थप्पड़... ज़ाहिर है जनता अब जूता उठाने के लिए जहमत करने के बजाए...सीधे थप्पड़ रसीद करना आसान समझ रही है...

Saturday, March 19, 2011

फरक्का नहीं फ़ज़ीहत मेल...




रेल बजट और आम बजट आने के कुछ दिनों बाद मुझे एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली से लखनऊ जाना था. अब अचानक से किसी अच्छी ट्रेन में तो टिकट मिलने से रहा लिहाजा जैसे-तैसे फरक्का मेल का टिकट लिया. पहली बार इस ट्रेन से जा रहा था इस वजह से कुछ लोगों से फीडबैक भी लिया. पता चला कि आज तक तो कभी लखनऊ वक्त पर पहुंची नहीं. ख़ैर मेरे पास कोई चारा भी नहीं था. कोढ़ में खाज का काम किया रेल रोको आंदोलन ने. पता चला कि मुरादाबाद ट्रैक पर काफूरपुर के पास एक समाज के लोग केन्द्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलित हैं. पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचकर ट्रेन की इंक्वायरी की तो थोड़ा जान में जान आई. मालूम हुआ कि ट्रेन अलीगढ़-हाथरस के रूट से चलती है और सही समय पर प्लेटफॉर्म से छूटेगी. थोड़ा सा औऱ सहारा मिला जब जाना कि फरक्का ट्रेन पश्चिम बंगाल के मालदा टाउन तक जाती है. ऐसे में मैंने अनुमान लगाया कि दीदी का गृहराज्य होने की वजह से ट्रेन ज़्यादा लेट नहीं होनी चाहिए.
                                                             दिल्ली से ट्रेन राइट टाइम पर छूटी. मेरे सामने की सीटें खाली थीं. ग़ाज़ियाबाद तक जाने वाले तीन युवक उसी सीट पर आराम फरमाने लगे. एक तो जूता पहने ही सोने लगा. रास्ते में उसके एक साथी ने जगाना चाहा तो बोला मुझे पता है कि अभी ग़ाज़ियाबाद नहीं आया. हिंडन नदी पड़ेगी तो मैं ख़ुद-बख़ुद उठ जाऊंगा. बताते चलें कि हिंडन नदी ग़ाज़ियाबाद में है. हिंडन भी पार हुई और ग़ाज़ियाबाद भी आ गया. अब बारी थी असली स्क्रिप्ट की. युवक तो वहां उतर गए लेकिन खाली बर्थों के असली मालिक तो अब ट्रेन में चढ़े थे. ख़ुद को कांस्टेबल बताने वाले एक महाशय ट्रेन की बोगी में कुछ ऐसा घुसे कि एक वेंडर के हाथ से पूड़ी-सब्जी का पैकेट नीचे गिरा बैठे. पहले तो रौब गांठा, ट्रेन में भीड़ की दुहाई दी लेकिन वो कोई ऐरा-ग़ैरा थोड़े था. ऐसे में वेंडर के सामने सरेंडर करने में ही कांस्टेबल महोदय ने अपनी भलाई समझी. हां एक चालाकी ज़रूर खेली उसे सौ का नोट देकर. सोचा था फुटकर के फेर में फंसकर वेंडर पैसा वापस कर देगा, लेकिन वेंडर तो इसके आदी होते हैं. पलक झपकते ही उसने 90 रुपये गिनकर कांस्टेबल साहब को दे दिए. खाकी के खिलाड़ी के चेहरा देखने लायक था. अपना दुखड़ा मुझसे कहने लगे, लेकिन मेरी तरफ से शुष्क प्रतिक्रिया देखकर चुप हो गए.


ट्रेन अब ग़ाज़ियाबाद से चल चुकी थी. मेरी बर्थ मिडिल थी जबकि मेरे सामने की सीट पर बैठने वाले जो तीन लोग चढ़े थे उनके पास मेरे तरफ की निचली और ऊपर की बर्थ थी. ये एक बंगाली परिवार था- मां, बाप और बेटा. मुकाम मालदा टाउन. दरअसल मैं निचली बर्थ पर चद्दर बिछाकर लेट गया था. बंगाली परिवार ने अपना टिकट दिखाकर मुझसे सीट नंबर की तस्दीक की. वो तीनों लोग अपना सामान रखकर सोने का इंतज़ाम करने लगे. बेटा तो सबसे ऊपर की बर्थ पर चला गया जबकि मां और बाप मेरे सामने की निचली और बीच की बर्थ पर लेटने जा रहे थे. इसी दौरान टीटी महोदय भी पहुंच गए. टिकट देखने के बाद बंगाली परिवार को अपनी बर्थ पता चल गई. पता नहीं क्यों युवक की मां अचानक ही मेरे ऊपर बरसने लगीं. बोलीं कि हम लोगों को अनपढ़-गंवार समझते हो, ग़लत सीट नंबर बताते हो और जाने क्या-क्या. मैंने कहा कि आप लोगों ने मुझसे सीट के बारे में पूछा और मैंने कहा कि यहीं है. अब भला इसमें मेरी क्या ग़लती. ख़ैर किसी तरह से रात बीती. रात की नींद तो गाना बजाने वालों ने हराम कर दी थी. कभी मुन्नी बदनाम तो कभी तेरे नाम ख़ुद भी सुनते रहे और सहयात्रियों को भी जबरन सुनाते रहे. सुबह हुई और गरम पानी की बढ़िया चाय का ट्रेन में आगमन हो चुका था. मैंने भी मन मसोसकर चाय को गले से उतारा. इसी दौरान मेरी निगाह साइड लोअर सीट पर बैठे एक दिलचस्प शख़्स पर पड़ी. चेहरे से ही अनुभवी यात्री मालूम पड़ रहे थे. बगल में बैठे एक सहयात्री ने सवाल दागा कि कहां तक चल रहे हैं भाई साहब...जवाब में वो महानुभाव बोले आधी दूरी तक. दूसरे ने फिर पूछा कि वो कैसे...तो कहने लगे कि बनारस तक की दूरी आधी हुई. अब ये बात और है कि उनको सुल्तानपुर तक ही जाना था. उनके तजुर्बे का मैं भी कायल हो गया और पूछ ही बैठा कि ये ट्रेन (फरक्का) कभी समय पर पहुंचती थी या नहीं. सुनते ही उनकी आंखों में मानो चमक आ गई. बोले कि भाई साहब 30 साल से ज़्यादा अरसे से इस ट्रेन से चल रहा हूं. 1985-86 में ये राइट टाइम रहा करती थी. आख़िरकार सुबह सवा 10 बजे के क़रीब में लखनऊ स्टेशन पहुंच ही गया. फरक्का अपने नियत समय से महज तीन घंटे ही लेट थी. ट्रेन से उतरते वक्त बंगाली परिवार के मुखिया ने मुझसे पूछा कि लखनऊ में ट्रेन कितनी देर रुकेगी. मैंने कहा कि वैसे तो 10-15 मिनट रुकनी चाहिए, लेकिन लखनऊ तो बड़ा स्टेशन है इसलिए देर तक भी रुक सकती है. हां उनको ये नहीं बताया कि यूपी में समाजवादी पार्टी के राज्य सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन की वजह से सपा कार्यकर्ता ट्रेन को कहीं भी खड़ी कर सकते हैं. ख़ैर मैं तो अपने मुकाम लखनऊ पहुंच चुका था इसलिए थोड़ा बेपरवाह होकर प्रीपेड टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ चला. मेरे ख्याल से फरक्का मेल में ये मेरी पहली और आख़िरी यात्रा साबित होगी...
 
संप्रति- सुधाकर सिंह


दिनांक- 19-03-2011


मोबाइल- 8860764647

Sunday, March 13, 2011

किसी की तरफ नहीं देखा...

कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ नहीं देखा...
तुम्हारे बाद किसी की तरफ नहीं देखा...
ये सोचकर कि तेरा इंतज़ार लाज़िम है...
तमाम उम्र घड़ी की तरफ नहीं देखा...

                                                   मुनव्वर राना...

Saturday, September 25, 2010

बेकल कबीर जैसा था...

सुना है मोमिन व गालिब न मीर जैसा था
 
हमारे गांव का शायर नज़ीर जैसा था

छिड़ेगी दैरो-हरम में ये बहस मेरे बाद

कहेंगे लोग कि बेकल कबीर जैसा था..

सोज़ है हिन्दी का तो उर्दू का इसमें साज़ है...
मेरे साथी गीत का मेरे यही अंदाज़ है...

वह कौशल्या पुत्र है या दशरथ का ताप...
मैं हूं उसकी खोज में जिसका शिवजी करते हैं जाप...

मैं तुलसी का वंशधर अवधपुरी है धाम...
सांस-सांस में सीता बसी, रोम-रोम में राम...

                                                                     बेकल उत्साही

Sunday, June 13, 2010

लखनऊ की शिगूफाई...

ग़रीब सीता के घर पे कब तक रावण की हुक्मरानी रहेगी...
द्रौपदी का लिबास कब तक उसके बदन से उतरा करेगा...
शकुंतला कब तक अंधी तक़दीर के भंवर में फंसा करेगी...
ये लखनऊ की शिगूफाई मक़बरों में कब तक दबी रहेगी...

अली सरदार जाफरी
अवध की ख़ाक-ए-हसीन से लिया गया अंश...

Friday, April 16, 2010

सितारों से आगे जहां और भी हैं...

सितारों से आगे जहां और भी हैं...


अभी इश्क में इम्तिहां और भी हैं...

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएं...

यहां सैकड़ों कारवां और भी हैं...

क़ायनात ना कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर...

चमन और भी आशियां और भी हैं...

अगर खो गया एक नश-ए-मन तो क्या ग़म...

मकामात-ए-आह-ओ-फुगां और भी हैं...

तू सही है परवाज़ है काम तेरा...

तेरे सामने आसमां और भी हैं...

इसी रोज़-ओ-शब में उलझकर ना रह जा...

कि तेरे ज़मीन-ओ-मकान और भी हैं...

गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में...

यहां अब मेरे राज़दां और भी हैं...

Sunday, August 23, 2009

गणपति बप्पा मोरया





आज से गणेश पूजा का दस दिवसीय उत्सव शुरू हो चुका है.सभी साथियों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं.मैं आज यूपी डेस्क के अपने सहयोगी के यहां डिनर पर आया हूं. बहुत दिनों बाद मौक़ा लगा है किसी मित्र के यहां भोजन का. ख़ैर भोजन के अलावा भी कुछ है बताने के लिए. मैं निज़ामशाही की यादों को संजोए शहर हैदराबाद के बाहरी इलाक़े में रहता हूं. ये जगह वनस्थलीपुरम के नाम से जानी जाती है. जोकि नेशनल हाइवे संख्या-९ पर स्थित है.ये रास्ता विजयवाड़ा को जाता है.और मैं देश के बड़े टेलीविज़न नेटवर्क में शुमार ईटीवी में काम करता हूं.जिसका हेडक्वार्टर इसी हाइवे पर रामोजी फ़िल्मसिटी में है. इन दिनों रोज़ जब मैं बस से अपने ऑफिस के लिए जाता था. तो सुषमा इलाके से थोड़ा आगे चलते ही बड़ी लगन और मेहनत से काम करते कारीगरों को गणपति की प्रतिमा बनाते देखता था. आज उनकी मेहनत सार्थक हो चुकी है.और गणेशजी की भव्य प्रतिमाएं जगह-जगह स्थापित हो चुकी हैं. इस रास्ते से गुजरते हुए दिन-बदिन मैंने इन मूर्तियों में बदलाव होते देखा.पहले उनका सांचा तैयार हुआ.फिर उसमें मूर्तियों को ढाला गया.और सबसे आख़िर में उनका रंग-रोगन किया गया. अब जबकि इन हुनरमंदों का काम ख़त्म हो चुका है.सवाल ये उठता है कि आगे ये कारीगर क्या करेंगे.क्योंकि गणेश पूजा का उत्सव तो अब एक साल बाद ही आएगा. देश में ऐसे ही तमाम लोग हैं जो सीज़नल आयोजन के लिए काम करते हैं.लेकिन बाद में बेकार हो जाते हैं.इन हुनरमंदों को वैकल्पिक काम देने की ज़रूरत है.सबसे सही तरीका है. नरेगा यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना से इन कारीगरों को जोड़ा जाए.अब बात नरेगा की हो रही है.तो थोड़ा इस पर भी बात कर लें. बीस अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती थी.और इस मौक़े पर दिल्ली में नरेगा पर एक राष्ट्रीय वर्कशॉप हुई.कार्यक्रम में देश के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री सीपी जोशी ने राजीव जी के सपनों को साकार करने की बात कही. राजीव जी का सपना था हर हाथ को मिले काम और घर-घर में हो खुशहाली.ये बात ठीक है कि जोशी जी इस दिशा में काफी गंभीर हैं.और यथासंभव क़दम उठा रहे हैं.लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है नरेगा की निगरानी.जिसके लिए अभी तक कोई ख़ास पहल नहीं की गई है. हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में जो तंत्र विकसित हो चुका है.उसमें इस योजना का दुरुपयोग भी जमकर हो रहा है.ग्राम पंचायत के प्रधान और सचिव मिलकर पैसे की बंदरबांट कर रहे हैं.यहीं नहीं उच्चाधिकारियों की भी इसमें मिलीभगत है.जिस भी ग्रामीण को काम मिल रहा है.उसके पास तक पूरी मज़दूरी पहुंच रही है कि नहीं ये एक अहम सवाल है.ज्यादातर लोग जो काम कर रहे हैं.उनमें अनपढ़ ग्रामीणों की तादाद ज़्यादा है.ऐसे में उनसे कुछ भी बताकर अंगूठा लगवा लिया जाता है. एक और पहलू है मज़दूरी की असमानता का...क्योंकि किसी राज्य में एक कार्यदिवस की मज़दूरी एक सौ चालीस रुपये तक है तो कहीं चालीस रुपये से भी कम है.हालांकि केंद्र सरकार का निर्देश है कि न्यूनतम साठ रुपये मज़दूरी मिलनी ही चाहिए.लेकिन इसकी जांच कौन कर रहा है. सीपी जोशी नरेगा कोर्ट की भी बात कर रहे हैं. लेकिन जोशी जी के सपने देखने से ही काम नहीं चलेगा.कुछ ठोस क़दम उठाते हुए उन्हें अमली जामा पहनाने की भी ज़रूरत है.जिससे नरेगा की तगड़ी मॉनिटरिंग भी हो सके. क्योंकि किसी ने ठीक कहा है कि सपने वो नहीं होते जो आप सोते समय देखते हैं...सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते. अब जोशी जी नींद वाले सपने देखने की उधेड़बुन में हैं.या फिर राजीव जी के सपनों को हक़ीकत में बदलने के लिए जोर-शोर से जुटेंगे. इसका हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा.

संप्रति- सुधाकर सिंह
टीवी पत्रकार
दिनांक- 23 अगस्त 2009
मोबाइल- 09010823314/ 09396582442

Sunday, August 16, 2009

हम आज़ाद हैं!
















काजू भुनी प्लेट में व्हिस्की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में.


पक्के समाजवादी हैं चाहे तस्कर हों या डकैत, इतना असर है खादी के उज़ले लिबास में.


पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें, संसद यहां की बदल गई है नख्ख़ास में.


आज़ादी का जश्न मनाएं तो किस तरह जो फुटपाथ पर आ गए घर की तलाश में...


देशभर में आज़ादी की बासठवीं सालगिरह का जश्न जोर-शोर से मनाया गया. ऐसे वक्त में मुझे मशहूर शायर अदम गोंडवी की ऊपर लिखी लाइनें फिर से याद आ गईं.एक बार फिर से देशभक्ति का जज्बा लोगों के दिलों में जमकर हिलोरें मारने के बाद ठंडा पड़ गया.हममें से ज्यादातर के लिए ये आज़ादी तो उसी तरह आई जैसे अंधे के हाथ में बटेर.हमने आज़ाद भारत में आंखें खोलीं.और वक्त गुजरने के साथ ही आज़ादी का मतलब अपने-अपने ढंग से निकाला.हम बदस्तूर ढिंढोरा पीटते रहे कि हम आज़ाद हैं.हम आज़ाद हैं.हमारे जैसे बहुत सारे युवा अपने छात्र जीवन के दौरान यहां तक कि अभी भी ट्रेन में मुफ्त सफर करने को अपनी जीत मानते हैं क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम बस में यात्रा के दौरान किसी बड़े-बूढ़े के आने पर अपनी सीट खाली नहीं करते हैं और वो भी तब जबकि हम आसानी से खड़े होकर सफर पूरा कर सकते हैं क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम कहीं भी दैनिक क्रिया से निवृत्त हो लेते हैं क्योंकि हम आज़ाद जो ठहरे.हम टैक्स चुराते हैं क्योंकि हम आज़ाद हैं.हमको बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलाने में मज़ा आता है क्योंकि हम तो ठहरे आज़ाद पंछी. हम लाइन में लगना अपनी शान में गुस्ताख़ी समझते हैं क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम मौका मिलते ही राह चलती किसी लड़की या महिला पर फब्तियां कसने से नहीं चूकते.यहां तक कि थोड़ी सी छूट मिली तो सारी हदें पार करने तक पर उतारू हो जाते हैं क्योंकि हमें प्यारी है अपनी आज़ादी.चाहे सड़क हो या स्कूल.सिनेमाहॉल हो या कोई पब्लिक प्लेस.जहां कहीं भी लिखा होता है कि कृपया यहां ना थूकें हम पान या गुटखे का पीक स्प्रे करने से बाज़ नहीं आते.क्योंकि हम आज़ाद हैं.नो स्मोकिंग जोन में हम कहीं भी सिगरेट सुलगा लेते हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हममें से बहुत सारे लोग बड़े-बुज़ुर्गों को ऐसे समय में अनाथ आश्रम में डाल देते हैं.जब उन्हें सहारे की सख़्त ज़रूरत होती है.क्योंकि उनके रहने से हमारी आज़ादी में खलल पड़ता है फिर भी हम कहते हैं कि हम आज़ाद हैं.उज्जैन से लेकर लखनऊ तक हम गुरुजनों पर करते हैं जानलेवा हमले.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम रिश्वत देते भी हैं और रिश्वत लेते भी हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.किसी को कुछ भी कह देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.क्योंकि हमें देश के संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो दी है.कोई गांधी को शैतान और माफ़िया तक कह डालता है.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम जगदगुरु शंकराचार्य को अकर्मण्य और खुद को कर्मयोगी बताते हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंकने वाले जरनैल सिंह भिंडरावाले की फोटो स्वर्ण मंदिर परिसर के म्यूज़ियम में लगाते हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम महात्मा गांधी,सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद,अशफाक या बिस्मिल के बजाय भ्रष्ट नेताओं की तस्वीर अपने घर में लगाते हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हम बात तो करते हैं शहीदों की चिताओं पर मेले लगने की लेकिन मौक़ा मिलते ही उनके ताबूतों की ख़रीद में भी दलाली खाने से नहीं चूकते हैं.क्योंकि हम आज़ाद हैं.हर साल छब्बीस जनवरी औऱ पंद्रह अगस्त को हम तिरंगा झंडा फहराने की खानापूर्ति करते हैं.औऱ शान से कहते हैं कि झंडा ऊंचा रहे हमारा.क्योंकि हम तो ठहरे आज़ाद हिंदुस्तान के आज़ाद नागरिक.अगर आज़ादी के मायने यही हैं तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या वाक़ई हम आज़ाद हैं??? अपने ही शहर के अज़ीम फ़नकार अली सरदार जाफरी के इन अल्फाज़ के साथ आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की दिली मुबारकबाद...


कौन आज़ाद हुआ किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी...


मेरे सीने में अभी दर्द है महक़ूमी का मादर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही।




संप्रति- सुधाकर सिंह

टीवी पत्रकार

मोबाइल- 09010823314, 09396582442

दिनांक- 15 अगस्त 2009

Saturday, April 11, 2009

हाथी नहीं गणेश है!




कहते हैं कि सियासत और ज़ंग में सब कुछ जायज है. आज के दौर में इस मिसाल को तमाम राजनीतिक पार्टियां गांठ बांधकर चल रही हैं. लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए नये-नये प्रयोगों की बात करें, तो बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी का नाम शिखर पर होगा. तिलक, तराजू और तलवार से लेकर हाथी के ब्रह्मा, विष्णु, महेश बनने तक के सफर में कई मोड़ ऐसे आए, जिनको देश की दशा और दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश की सियासत में टर्निंग प्वाइंट के तौर पर जाना जाएगा.

सत्तर के दशक के आखिरी सालों में दलित सरकारी कर्मचारियों की आवाज़ बने एक गैर सरकारी संगठन का ज़िक्र किए बगैर बसपा की कहानी अधूरी है. दरअसल कांशीराम ने दलित समुदाय का हाल जानने के लिए पूरे हिंदुस्तान का दौरा किया. और १९७८ में बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्यूनिटीज एम्प्लाइज यूनियन यानी बामसेफ बनाया. इसके बाद कांशीराम ने बौद्ध रिसर्च सेंटर (बीआरसी) और दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएस-४ की नींव भी रखी. समाज के दबे-कुचले लोगों के हित और सत्ता में सशक्त भागीदारी के मकसद से कांशीराम ने १९८४ में बसपा का गठन किया.

बीएसपी ने १९८४ के लोकसभा चुनाव में सियासी पारी का आगाज किया. लेकिन पार्टी को किसी भी सीट पर सफलता हासिल नहीं हुई. १९८९ के आम चुनाव में बसपा के दो उम्मीदवार संसद की चौखट लांघने में कामयाब रहे. इसके बाद तो पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बसपा ने १९८९ में यूपी के विधानसभा चुनाव में १३ सीटों पर कामयाबी हासिल की. १९९१ में पार्टी की सीट घटकर १२ ही रह गई. १९९३ और १९९६ में दोनों बार बसपा के ६७ प्रत्याशी विधायक बनने में सफल रहे. ये वो दौर था जब गठबंधन की राजनीति अपने परवान पर चढ़ रही थी. १९९५ में मायावती जब पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने इसे लोकतंत्र का चमत्कार बताया था. हालांकि विवादास्पद स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती और मुलायम सिंह के रास्ते अलग-अलग हो गए.

भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से १९९७ और २००२ में मायावती फिर से सीएम की गद्दी तक पहुंचने में कामयाब रहीं. २००२ के विधासभा चुनाव में बसपा को ९८ सीटों पर सफलता मिली. वहीं १९९९ के आम चुनाव में पार्टी के १४ लोकसभा सदस्य चुने गए. जबकि २००४ में चौदहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में बसपा का आंकड़ा १९ सीटों तक पहुंच गया. यूपी में २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया. नतीजतन मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुईं. इस चुनाव में पार्टी को रिकॉर्ड २०६ सीटों पर सफलता हासिल हुई.

कभी उच्च जातियों के ख़िलाफ़ कड़ा तेवर रखने वाली बसपा अब सर्वजन हिताय बहुजन सुखाय की राह पर है.मनुवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ आर-पार की लड़ाई लड़ने वाली बसपा का मूड अब थोड़ा सा बदला हुआ है. उदाहरण के तौर पर २००७ के चुनाव में पार्टी के इन दो नारों के बोल काफी कुछ बयां करते हैं. हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा, विष्णु, महेश है.....ब्राह्मण शंख बजाएगा...हाथी बढ़ता जाएगा. पार्टी के मास्टरमाइंड सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई में यूपी के हर ज़िले के गांव-गांव में ब्राह्मण-दलित भाईचारा कमेटी बनाई गई है. जाहिर है लोकतंत्र संख्या बल का खेल है. और इस खेल में ताकत बढ़ाने के लिए बहुत सारी चीजें ताक पर रखनी पड़ती हैं. चाल, चरित्र, चेहरा और ना जाने क्या-क्या बदलना पड़ता है. क्योंकि बड़े फायदे के लिए छोटा नुकसान तो सहना ही पड़ता है. पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की काफी सीटों पर अगड़ी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया है. यूपी में सत्ता सुख हासिल करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की नज़र अब दिल्ली की कुर्सी पर है. और गठबंधन की राजनीति के आज के दौर में ऐसा होना नामुमकिन भी नहीं।


दिनांक- 11-04-2009

संप्रति- सुधाकर सिंह

मोबाइल- 09396582442

क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे


गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
क्या उससे किसी क़ौम की तक़दीर बदल दोगे
जो अक्स उभरता है रसखान की नज़्मों से
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे
जायस से हिंदी की दरिया जो बहके आई
मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे
क्या सच है देशमुख के कहने से विशेषज्ञों
मुमताज़ के ख़्वाबों की ताबीर बदल दोगे
तारीख बताती है तुम तो भी लुटेरे हो
क्या द्रविड़ों से छीनी हुई जागीर बदल दोगे।

अदम गोंडवी (जनकवि)

Sunday, April 5, 2009

जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत

काजू भुनी प्लेट में व्हिस्की गिलास में...
उतरा है रामराज विधायक निवास में...
पक्के समाजवादी हैं चाहे तस्कर हों या डकैत...
इतना असर है खादी के उजले लिबास में...
आज़ादी का जश्न मनाएं तो किस तरह...
जो फुटपाथ पर आ गए घर की तलाश में...
पैसे से आप जो चाहे खरीद लें...
संसद यहां की बदल गई है नखास में...
जनता के पास एक ही चारा है बगावत...
ये बात कह रहा हूं मैं पूरे होशो-हवास में...

अदम गोंडवी (जनकवि)

Monday, March 23, 2009

दिलचस्प लड़ाई है श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र में






नवसृजित श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। इस लोकसभा क्षेत्र में तीन विधानसभाएं बलरामपुर जनपद से और दो विधानसभाएं श्रावस्ती जनपद से हैं। बलरामपुर, तुलसीपुर और गैंसड़ी विधानसभा बलरामपुर जनपद से है जबकि इकौना और भिनगा विधानसभा श्रावस्ती जनपद से संबंधित है। नए परिसीमन के कारण चुनावी समीकरण भी काफी बदले हुए हैं। चुनावी परिदृश्य में बसपा से रिज़वान ज़हीर, भाजपा से सत्यदेव सिंह और सपा से रुआब सईदा किस्मत आजमा रही हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री और बलरामपुर सदर सीट से दो बार विधायक रह चुके विनय कुमार पाण्डे को टिकट दिया है । जहां रिज़वान ज़हीर दो बार बलरामपुर सीट से सांसद रह चुके हैं वहीं भाजपा के सत्यदेव सिंह भी इस क्षेत्र से दो बार देश की संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं। यह अलग बात है कि उस दौरान ये क्षेत्र पुराने परिसीमन के तहत बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र के नाम से था। साथ ही इसमें मुस्लिम बाहुल्य उतरौला और सादुल्लाहनगर विधानसभा सीट भी सम्मिलित थी।


रिज़वान ज़हीर को बसपा के परंपरागत वोटों के अलावा राजपूतों औऱ मुस्लिम वोटों का भी समर्थन हासिल है। बलरामपुर इलाके में रिज़वान ज़हीर को मुस्लिम वोट बैंक पर एकाधिकार हासिल है। गौर करने वाली बात है कि २००१ की जनगणना के मुताबिक बलरामपुर देश के माइनॉरिटी कॉन्सेन्ट्रेटेड डिस्ट्रिक्ट्स (घनी अल्पसंख्यक आबादी वाले ज़िले) की श्रेणी में आता है। आंकड़ों के अनुसार बलरामपुर ज़िले की जनसंख्या लगभग १६ लाख ८४ हजार ५६७ है, जिसमें से करीब २६ फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। ऐसे में रिज़वान ज़हीर के मज़बूत सियासी समीकरण को आसानी से समझा जा सकता है। इलाके में रिज़वान ज़हीर किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं। बानगी के तौर पर २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा के धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू को बलरामपुर सदर सीट से जिताने में उनकी ख़ास भूमिका रही है। साथ ही सियासी अदावत के चलते मुलायम सरकार में राज्यमंत्री रहे और सपा ज़िलाध्यक्ष शिव प्रताप यादव को गैंसड़ी सीट से बसपा प्रत्याशी अलाउद्दीन के हाथों हरवाने में भी रिज़वान का ही योगदान रहा। अपने मुस्लिम वोट बैंक की ताकत के बूते ही रिज़वान ने १९९८ और १९९९ में लगातार दो बार सपा उम्मीदवार के तौर पर संसद की चौखट लांघने में सफलता हासिल की। २००४ के लोकसभा चुनाव में पार्टी के ज़िलाध्यक्ष शिव प्रताप यादव से विरोध के चलते रिज़वान ने सपा का दामन छोड़ दिया और बागी तेवर दिखाते हुए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तक को बलरामपुर सीट से लड़ने की चुनौती दे डाली थी। रिज़वान का बयान था कि मैं ऐसा घोड़ा हूं जिस पर हर कोई दांव लगाना चाहता है। ये अलग बात है कि बसपा अम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए वे भाजपा के बृजभूषण शरण सिंह से करीब ५३ हजार वोटों से पराजित हो गए थे। रिज़वान की हार के पीछे सपा द्वारा मुस्लिम प्रत्याशी डॉ मोहम्मद उमर को खड़ा किया जाना भी था। चुनाव में उमर को करीब १ लाख ६५ हजार वोट मिले थे, वहीं रिज़वान को लगभग २ लाख १७ हज़ार वोट हासिल हुए थे। जबकि बृजभूषण सिंह ने इकलौते हिंदू प्रत्याशी होने का फायदा उठाते हुए करीब २ लाख ७० हजार वोट हासिल किए और चुनावी वैतरणी पार करने में सफलता पाई।
वहीं सपा प्रत्याशी रुआब सईदा को श्रावस्ती क्षेत्र की दोनों विधानसभओं में मुस्लिम समुदाय के अच्छे ख़ासे तबके का समर्थन हासिल है। रुआब सईदा बहराइच सदर सीट से विधायक और मुलायम सिंह यादव सरकार में मंत्री रहे कद्दावर नेता वकार अहमद शाह की पत्नी हैं। साथ ही सईदा बहराइच लोकसभा सीट से वर्तमान सांसद भी हैं। सईदा को सपा के समर्पित यादव वोट बैंक और और अन्य पिछड़े वर्ग के वोटों का पूरा भरोसा है। ऐसे में रुआब सईदा को हल्के में लेने की भूल किसी भी उम्मीदवार के लिए घातक साबित हो सकती है। अगर भाजपा के उम्मीदवार सत्यदेव सिंह की बात करें तो तो वे इस क्षेत्र से १९९१ और १९९६ में दो बार सांसद रह चुके हैं। लेकिन उनकी जीत में व्यक्तिगत प्रभाव कम, राम लहर और वोट कमल पर...दृष्टि अटल पर की अंडर करेंट का ज्यादा हाथ रहा था। सत्यदेव सिंह भाजपा के परंपरागत ब्राह्मण और बनिया वोटों पर निर्भर हैं। सत्यदेव को एकमात्र ठाकुर प्रत्याशी होने के नाते इलाके के राजपूत वोटों का भी कुछ हद तक भरोसा है। लेकिन यूपी में भाजपा की कमजोर हालत का असर यहां भी देखने को मिले तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। हालांकि नवसृजित इस क्षेत्र में ब्राह्मण वोटरों की तादाद तीन लाख से ज्यादा है औऱ कांग्रेस ने विनय कुमार पांडे का टिकट फाइनल करके सारे सियासी समीकरण गड़बड़ा दिए हैं । ऐसे में इस सीट पर सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच कांटे का दिलचस्प त्रिकोणीय संघर्ष देखने को मिलेगा। इलाके में विनय कुमार पाण्डे की छवि सर्वमान्य और रसूखदार ब्राह्मण नेता की रही है। जातीय दृष्टि से देखा जाय तो श्रावस्ती लोकसभा में ब्राह्मणों और मुस्लिमों की संख्या क़रीब-क़रीब बराबर है। ऐसे में इन्हीं दो जातियों के वोटों के आधार पर ही किसी प्रत्याशी की हार या जीत की इबारत लिखी जाएगी।


संप्रति- सुधाकर सिंह

टीवी पत्रकार

दिनांक- 24-03-2009

मोबाइल- 09396582442


Saturday, March 7, 2009

गांधीवाद बनाम गांधीगीरी










दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल...साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...वाकई में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जंग-ए-आज़ादी की लड़ाई में अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को स्वतंत्र तो करा दिया लेकिन आज आज़ादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद गांधी अपने ही देश में बेगाने हो गए हैं,,,न्यूय़ॉर्क में गाधी के जीवन से जुड़ी चीजों की 5 मार्च 2009 को नीलामी हुई...आखिरकार बापू का चश्मा...जेब घड़ी..एक जोड़ी चमड़े की चप्पलें..पीतल की थाली और एक कटोरी नीलाम हो गई...गौर करने वाली बात है कि बापू के इन सामानों को खरीदा शराब व्यवसाई विजय माल्या ने...माल्या देश की जानी-मानी शराब कंपनी यूनाइटेड ब्रेवरीज के मालिक हैं...यानी गांधी जी ने जिस एक चीज की ज़िंदगी भर मुखालफत की...उसी को बनाने वाली कंपनी के मालिक ने गांधीगीरी दिखाते हुए उनके व्यक्तिगत सामानों को क़रीब नौ करोड़ रुपये में खरीदा..खैर गांधीगीरी और नेतागीरी का नया घालमेल आजकल देखने को मिल रहा है तो माल्या ने गांधी की विरासत को खरीद लिया तो उसमें हर्ज ही क्या है...अब सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास गांधी की विरासत को सहेजने के लिए नौ करोड़ रुपये नहीं हैं..या सरकार को इस विरासत की हिफाजत करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है...ज्यादा दूर मत जाइये..देश की ही बात कर लेते हैं...कोदाल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में गांधी संग्रहालय से बापू की छह हजार से ज्यादा चिट्ठियां गायब हो चुकी हैं...लेकिन सरकार ने अभी तक इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं की है..और करे भी क्यों...इससे सरकार को कोई राजनीतिक नफा-नुकसान होने वाला नहीं है...गांधी तो राजनीति के लिए हैं..उनका नाम अक्सर लिया जाता है...जनता को बरगलाने के लिए..खादी की लिबास में बड़े-बड़े राजनेता चुनावी मंच से गांधी के आदर्शों पर चलने की बात करते हैं..यानी दिन में रघुपति राघव राजाराम...लेकिन शाम होते ही ढाई सौ ग्राम के फेर में पड़कर बापू को भूलने में पल भर भी नहीं लगाते हैं..चुनावी बिगुल बज चुका है..आने वाले दिनों में गांधी की विरासत पर सियासी पार्टियां अपना-अपना हक जताने की पूरी उधेड़बुन में रहेंगी...क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार शुरू हो चुका है...तो जाहिर है गांधीवाद और गांधीगीरी में कुछ तो फर्क रहेगा ही...






सुधाकर सिंह

संप्रति- टीवी पत्रकार

07-3-2009

मोबाइल- 09396582442