Saturday, April 11, 2009

हाथी नहीं गणेश है!




कहते हैं कि सियासत और ज़ंग में सब कुछ जायज है. आज के दौर में इस मिसाल को तमाम राजनीतिक पार्टियां गांठ बांधकर चल रही हैं. लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए नये-नये प्रयोगों की बात करें, तो बहुजन समाज पार्टी यानी बीएसपी का नाम शिखर पर होगा. तिलक, तराजू और तलवार से लेकर हाथी के ब्रह्मा, विष्णु, महेश बनने तक के सफर में कई मोड़ ऐसे आए, जिनको देश की दशा और दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश की सियासत में टर्निंग प्वाइंट के तौर पर जाना जाएगा.

सत्तर के दशक के आखिरी सालों में दलित सरकारी कर्मचारियों की आवाज़ बने एक गैर सरकारी संगठन का ज़िक्र किए बगैर बसपा की कहानी अधूरी है. दरअसल कांशीराम ने दलित समुदाय का हाल जानने के लिए पूरे हिंदुस्तान का दौरा किया. और १९७८ में बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्यूनिटीज एम्प्लाइज यूनियन यानी बामसेफ बनाया. इसके बाद कांशीराम ने बौद्ध रिसर्च सेंटर (बीआरसी) और दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएस-४ की नींव भी रखी. समाज के दबे-कुचले लोगों के हित और सत्ता में सशक्त भागीदारी के मकसद से कांशीराम ने १९८४ में बसपा का गठन किया.

बीएसपी ने १९८४ के लोकसभा चुनाव में सियासी पारी का आगाज किया. लेकिन पार्टी को किसी भी सीट पर सफलता हासिल नहीं हुई. १९८९ के आम चुनाव में बसपा के दो उम्मीदवार संसद की चौखट लांघने में कामयाब रहे. इसके बाद तो पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बसपा ने १९८९ में यूपी के विधानसभा चुनाव में १३ सीटों पर कामयाबी हासिल की. १९९१ में पार्टी की सीट घटकर १२ ही रह गई. १९९३ और १९९६ में दोनों बार बसपा के ६७ प्रत्याशी विधायक बनने में सफल रहे. ये वो दौर था जब गठबंधन की राजनीति अपने परवान पर चढ़ रही थी. १९९५ में मायावती जब पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने इसे लोकतंत्र का चमत्कार बताया था. हालांकि विवादास्पद स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती और मुलायम सिंह के रास्ते अलग-अलग हो गए.

भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से १९९७ और २००२ में मायावती फिर से सीएम की गद्दी तक पहुंचने में कामयाब रहीं. २००२ के विधासभा चुनाव में बसपा को ९८ सीटों पर सफलता मिली. वहीं १९९९ के आम चुनाव में पार्टी के १४ लोकसभा सदस्य चुने गए. जबकि २००४ में चौदहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में बसपा का आंकड़ा १९ सीटों तक पहुंच गया. यूपी में २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया. नतीजतन मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुईं. इस चुनाव में पार्टी को रिकॉर्ड २०६ सीटों पर सफलता हासिल हुई.

कभी उच्च जातियों के ख़िलाफ़ कड़ा तेवर रखने वाली बसपा अब सर्वजन हिताय बहुजन सुखाय की राह पर है.मनुवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ आर-पार की लड़ाई लड़ने वाली बसपा का मूड अब थोड़ा सा बदला हुआ है. उदाहरण के तौर पर २००७ के चुनाव में पार्टी के इन दो नारों के बोल काफी कुछ बयां करते हैं. हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा, विष्णु, महेश है.....ब्राह्मण शंख बजाएगा...हाथी बढ़ता जाएगा. पार्टी के मास्टरमाइंड सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई में यूपी के हर ज़िले के गांव-गांव में ब्राह्मण-दलित भाईचारा कमेटी बनाई गई है. जाहिर है लोकतंत्र संख्या बल का खेल है. और इस खेल में ताकत बढ़ाने के लिए बहुत सारी चीजें ताक पर रखनी पड़ती हैं. चाल, चरित्र, चेहरा और ना जाने क्या-क्या बदलना पड़ता है. क्योंकि बड़े फायदे के लिए छोटा नुकसान तो सहना ही पड़ता है. पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की काफी सीटों पर अगड़ी जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया है. यूपी में सत्ता सुख हासिल करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की नज़र अब दिल्ली की कुर्सी पर है. और गठबंधन की राजनीति के आज के दौर में ऐसा होना नामुमकिन भी नहीं।


दिनांक- 11-04-2009

संप्रति- सुधाकर सिंह

मोबाइल- 09396582442

क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे


गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
क्या उससे किसी क़ौम की तक़दीर बदल दोगे
जो अक्स उभरता है रसखान की नज़्मों से
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे
जायस से हिंदी की दरिया जो बहके आई
मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे
क्या सच है देशमुख के कहने से विशेषज्ञों
मुमताज़ के ख़्वाबों की ताबीर बदल दोगे
तारीख बताती है तुम तो भी लुटेरे हो
क्या द्रविड़ों से छीनी हुई जागीर बदल दोगे।

अदम गोंडवी (जनकवि)

Sunday, April 5, 2009

जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत

काजू भुनी प्लेट में व्हिस्की गिलास में...
उतरा है रामराज विधायक निवास में...
पक्के समाजवादी हैं चाहे तस्कर हों या डकैत...
इतना असर है खादी के उजले लिबास में...
आज़ादी का जश्न मनाएं तो किस तरह...
जो फुटपाथ पर आ गए घर की तलाश में...
पैसे से आप जो चाहे खरीद लें...
संसद यहां की बदल गई है नखास में...
जनता के पास एक ही चारा है बगावत...
ये बात कह रहा हूं मैं पूरे होशो-हवास में...

अदम गोंडवी (जनकवि)

Monday, March 23, 2009

दिलचस्प लड़ाई है श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र में






नवसृजित श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। इस लोकसभा क्षेत्र में तीन विधानसभाएं बलरामपुर जनपद से और दो विधानसभाएं श्रावस्ती जनपद से हैं। बलरामपुर, तुलसीपुर और गैंसड़ी विधानसभा बलरामपुर जनपद से है जबकि इकौना और भिनगा विधानसभा श्रावस्ती जनपद से संबंधित है। नए परिसीमन के कारण चुनावी समीकरण भी काफी बदले हुए हैं। चुनावी परिदृश्य में बसपा से रिज़वान ज़हीर, भाजपा से सत्यदेव सिंह और सपा से रुआब सईदा किस्मत आजमा रही हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री और बलरामपुर सदर सीट से दो बार विधायक रह चुके विनय कुमार पाण्डे को टिकट दिया है । जहां रिज़वान ज़हीर दो बार बलरामपुर सीट से सांसद रह चुके हैं वहीं भाजपा के सत्यदेव सिंह भी इस क्षेत्र से दो बार देश की संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं। यह अलग बात है कि उस दौरान ये क्षेत्र पुराने परिसीमन के तहत बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र के नाम से था। साथ ही इसमें मुस्लिम बाहुल्य उतरौला और सादुल्लाहनगर विधानसभा सीट भी सम्मिलित थी।


रिज़वान ज़हीर को बसपा के परंपरागत वोटों के अलावा राजपूतों औऱ मुस्लिम वोटों का भी समर्थन हासिल है। बलरामपुर इलाके में रिज़वान ज़हीर को मुस्लिम वोट बैंक पर एकाधिकार हासिल है। गौर करने वाली बात है कि २००१ की जनगणना के मुताबिक बलरामपुर देश के माइनॉरिटी कॉन्सेन्ट्रेटेड डिस्ट्रिक्ट्स (घनी अल्पसंख्यक आबादी वाले ज़िले) की श्रेणी में आता है। आंकड़ों के अनुसार बलरामपुर ज़िले की जनसंख्या लगभग १६ लाख ८४ हजार ५६७ है, जिसमें से करीब २६ फीसदी आबादी मुस्लिम समुदाय की है। ऐसे में रिज़वान ज़हीर के मज़बूत सियासी समीकरण को आसानी से समझा जा सकता है। इलाके में रिज़वान ज़हीर किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं। बानगी के तौर पर २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा के धीरेंद्र प्रताप सिंह धीरू को बलरामपुर सदर सीट से जिताने में उनकी ख़ास भूमिका रही है। साथ ही सियासी अदावत के चलते मुलायम सरकार में राज्यमंत्री रहे और सपा ज़िलाध्यक्ष शिव प्रताप यादव को गैंसड़ी सीट से बसपा प्रत्याशी अलाउद्दीन के हाथों हरवाने में भी रिज़वान का ही योगदान रहा। अपने मुस्लिम वोट बैंक की ताकत के बूते ही रिज़वान ने १९९८ और १९९९ में लगातार दो बार सपा उम्मीदवार के तौर पर संसद की चौखट लांघने में सफलता हासिल की। २००४ के लोकसभा चुनाव में पार्टी के ज़िलाध्यक्ष शिव प्रताप यादव से विरोध के चलते रिज़वान ने सपा का दामन छोड़ दिया और बागी तेवर दिखाते हुए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव तक को बलरामपुर सीट से लड़ने की चुनौती दे डाली थी। रिज़वान का बयान था कि मैं ऐसा घोड़ा हूं जिस पर हर कोई दांव लगाना चाहता है। ये अलग बात है कि बसपा अम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए वे भाजपा के बृजभूषण शरण सिंह से करीब ५३ हजार वोटों से पराजित हो गए थे। रिज़वान की हार के पीछे सपा द्वारा मुस्लिम प्रत्याशी डॉ मोहम्मद उमर को खड़ा किया जाना भी था। चुनाव में उमर को करीब १ लाख ६५ हजार वोट मिले थे, वहीं रिज़वान को लगभग २ लाख १७ हज़ार वोट हासिल हुए थे। जबकि बृजभूषण सिंह ने इकलौते हिंदू प्रत्याशी होने का फायदा उठाते हुए करीब २ लाख ७० हजार वोट हासिल किए और चुनावी वैतरणी पार करने में सफलता पाई।
वहीं सपा प्रत्याशी रुआब सईदा को श्रावस्ती क्षेत्र की दोनों विधानसभओं में मुस्लिम समुदाय के अच्छे ख़ासे तबके का समर्थन हासिल है। रुआब सईदा बहराइच सदर सीट से विधायक और मुलायम सिंह यादव सरकार में मंत्री रहे कद्दावर नेता वकार अहमद शाह की पत्नी हैं। साथ ही सईदा बहराइच लोकसभा सीट से वर्तमान सांसद भी हैं। सईदा को सपा के समर्पित यादव वोट बैंक और और अन्य पिछड़े वर्ग के वोटों का पूरा भरोसा है। ऐसे में रुआब सईदा को हल्के में लेने की भूल किसी भी उम्मीदवार के लिए घातक साबित हो सकती है। अगर भाजपा के उम्मीदवार सत्यदेव सिंह की बात करें तो तो वे इस क्षेत्र से १९९१ और १९९६ में दो बार सांसद रह चुके हैं। लेकिन उनकी जीत में व्यक्तिगत प्रभाव कम, राम लहर और वोट कमल पर...दृष्टि अटल पर की अंडर करेंट का ज्यादा हाथ रहा था। सत्यदेव सिंह भाजपा के परंपरागत ब्राह्मण और बनिया वोटों पर निर्भर हैं। सत्यदेव को एकमात्र ठाकुर प्रत्याशी होने के नाते इलाके के राजपूत वोटों का भी कुछ हद तक भरोसा है। लेकिन यूपी में भाजपा की कमजोर हालत का असर यहां भी देखने को मिले तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। हालांकि नवसृजित इस क्षेत्र में ब्राह्मण वोटरों की तादाद तीन लाख से ज्यादा है औऱ कांग्रेस ने विनय कुमार पांडे का टिकट फाइनल करके सारे सियासी समीकरण गड़बड़ा दिए हैं । ऐसे में इस सीट पर सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच कांटे का दिलचस्प त्रिकोणीय संघर्ष देखने को मिलेगा। इलाके में विनय कुमार पाण्डे की छवि सर्वमान्य और रसूखदार ब्राह्मण नेता की रही है। जातीय दृष्टि से देखा जाय तो श्रावस्ती लोकसभा में ब्राह्मणों और मुस्लिमों की संख्या क़रीब-क़रीब बराबर है। ऐसे में इन्हीं दो जातियों के वोटों के आधार पर ही किसी प्रत्याशी की हार या जीत की इबारत लिखी जाएगी।


संप्रति- सुधाकर सिंह

टीवी पत्रकार

दिनांक- 24-03-2009

मोबाइल- 09396582442


Saturday, March 7, 2009

गांधीवाद बनाम गांधीगीरी










दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल...साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...वाकई में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जंग-ए-आज़ादी की लड़ाई में अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को स्वतंत्र तो करा दिया लेकिन आज आज़ादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद गांधी अपने ही देश में बेगाने हो गए हैं,,,न्यूय़ॉर्क में गाधी के जीवन से जुड़ी चीजों की 5 मार्च 2009 को नीलामी हुई...आखिरकार बापू का चश्मा...जेब घड़ी..एक जोड़ी चमड़े की चप्पलें..पीतल की थाली और एक कटोरी नीलाम हो गई...गौर करने वाली बात है कि बापू के इन सामानों को खरीदा शराब व्यवसाई विजय माल्या ने...माल्या देश की जानी-मानी शराब कंपनी यूनाइटेड ब्रेवरीज के मालिक हैं...यानी गांधी जी ने जिस एक चीज की ज़िंदगी भर मुखालफत की...उसी को बनाने वाली कंपनी के मालिक ने गांधीगीरी दिखाते हुए उनके व्यक्तिगत सामानों को क़रीब नौ करोड़ रुपये में खरीदा..खैर गांधीगीरी और नेतागीरी का नया घालमेल आजकल देखने को मिल रहा है तो माल्या ने गांधी की विरासत को खरीद लिया तो उसमें हर्ज ही क्या है...अब सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास गांधी की विरासत को सहेजने के लिए नौ करोड़ रुपये नहीं हैं..या सरकार को इस विरासत की हिफाजत करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है...ज्यादा दूर मत जाइये..देश की ही बात कर लेते हैं...कोदाल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में गांधी संग्रहालय से बापू की छह हजार से ज्यादा चिट्ठियां गायब हो चुकी हैं...लेकिन सरकार ने अभी तक इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं की है..और करे भी क्यों...इससे सरकार को कोई राजनीतिक नफा-नुकसान होने वाला नहीं है...गांधी तो राजनीति के लिए हैं..उनका नाम अक्सर लिया जाता है...जनता को बरगलाने के लिए..खादी की लिबास में बड़े-बड़े राजनेता चुनावी मंच से गांधी के आदर्शों पर चलने की बात करते हैं..यानी दिन में रघुपति राघव राजाराम...लेकिन शाम होते ही ढाई सौ ग्राम के फेर में पड़कर बापू को भूलने में पल भर भी नहीं लगाते हैं..चुनावी बिगुल बज चुका है..आने वाले दिनों में गांधी की विरासत पर सियासी पार्टियां अपना-अपना हक जताने की पूरी उधेड़बुन में रहेंगी...क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार शुरू हो चुका है...तो जाहिर है गांधीवाद और गांधीगीरी में कुछ तो फर्क रहेगा ही...






सुधाकर सिंह

संप्रति- टीवी पत्रकार

07-3-2009

मोबाइल- 09396582442

Saturday, February 28, 2009

मंजिलों से दूर हो गए


(विकास जी हमारी मित्रमंडली में पडरौना का प्रतिनिधित्व करते हैं...बुद्ध की निर्वाणस्थली कुशीनगर से केवल १८ किलोमीटर की दूरी पर स्थित पडरौना के विकास जी बहुत कुछ कहना चाहते हैं..और आने वाले दिनों में अपनी मदहोश करने वाली लेखनी से इस बगिया को गुलज़ार करेंगे...इनका कवि हृदय बहुत सारे अनछुए पहलुओं पर रोशनी डालता है...तो आइये देखते हैं क्या कुछ बयां किया है विकास जी ने अपने इस पहले इजहार-ए-अंजुमन में )

गम इस बात का नहीं वो हमसे दूर हो गए..

हमसे मिलने के बाद और मशहूर हो गए..

सुना था अपने बुजुर्गों को ये कहते हुए...

सरहद के सीने पर उभरी जो लकीर हम अपनों से बहुत दूर हो गए..

देश तो अपना है मगर लोग पराए से लगते हैं यहां...

ये भी सुना है खिड़कियां दरवाजे पहचानने से मज़बूर हो गए..

जात-पात का ये कैसा जाल फेंका इन नेताओं ने...

देखा है आज भी उन्हें इस गली से साथ-साथ निकलते हुए...

क्या दो जून की रोटी कमाना ही था मकसद विकास का...

कदम ठहर से गए और मंजिलों से दूर हो गए....

विकास यादव

संप्रति- टीवी पत्रकार

तारीख- २८-०२-२००९

मोबाइल- ०९७०४३९०४८५

Tuesday, November 4, 2008

ये कैसी छात्र राजनीति?











जब मैं लखनऊ के कॉल्विन ताल्लुकेदार्स कॉलेज में पढ़ता था...तो अक्सर लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर को बाहर से देखने का मौका मिला करता था। बताना चाहूंगा कि कॉल्विन और लखनऊ विवि ठीक एक दूसरे के सामने स्थित हैं...बस अंतर केवल दोनों के बीच से गुजरती सड़क का है। मंगलवार के दिन विवि के ठीक बगल में हनुमान सेतु पर बजरंग बली के दर्शन को भी जाया करता था...इन्हीं दिनों में मैंने एक सपना देखा..सपना था लखनऊ विवि में बतौर छात्र अध्ययन करने का। सपना पूरा भी हुआ..हालांकि सपना पूरा होने में एक दशक लग गए..अब मैं लखनऊ विवि का संस्थागत छात्र हो चुका था।
बात साल २००४ की है..लखनऊ में मुलायम सिंह की सरकार थी और छात्र राजनीति अपने परवान पर चढ़ चुकी थी..मैंने मॉस कम्युनिकेशन के पीजी कोर्स में दाखिला लिया था..विवि परिसर छात्र नेताओं के पोस्टरों और बैनरों से पूरी तरह पट चुका था...फ़िज़ाओं में तमाम तरह के नारे अक्सर गूंज जाते थे..उदाहरण के तौर पर- सत्यनिष्ठ कर्तव्य परायण, तेज नारायण तेज नारायण...यही पुराण यही रामायण तेज नारायण तेज नारायण। ये तेज नारायण कोई और नहीं उपाध्यक्ष पद के लिए छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे तेज नारायण पाण्डेय उर्फ पवन पाण्डेय थे। यानी छात्र राजनीति के लिए पूरा उन्मुक्त माहौल तैयार हो चुका था।
मेरी फैकल्टी में पीटीआई से संजय पाण्डेयजी क्लास लेने आया करते थे..मुझे आज भी याद है कि चुनाव में छात्र नेताओं के उपनामों पर संजय जी के एक कमेंट पर क्लास में जबरदस्त ठहाका लगा था..दरअसल उन्होंने एक सवाल पूछा था...Does anybody know how many Pintoo's are there in LUSU elections? और जवाब भी अलग-अलग तरह के आए किसी ने विजय कुमार सिंह टिंटू का नाम लिया तो कोई बोला विजय शंकर पिंटू तो किसी की जुबान पर इन्द्रेश मिश्रा शिंटू का नाम था।
उन दिनों मैं अपने मित्र जितेंद्र के पास गाहे-बगाहे मिलने के लिए जाया करता था। जितेंद्र अन्तःवासी छात्र थे अब आप कहेंगे कि अंतःवासी मतलब...दरअसल अंतःवासी उस छात्र को कहा जाता है जो विवि परिसर में ही स्थित छात्रावास में रहते हैं। जितेंद्र कैम्पस के लाल बहादुर शास्त्री हॉस्टल के कमरा नं- १५९ में रहते थे। मैं और जितेंद्र क्लास के बाद जब भी मौका मिलता था टैगोर लाइब्रेरी आते थे और परिसर में छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप पर चर्चा किया करते थे।
एक वाकया याद आता है..जब विवि में मुलायम सिंह और अमर सिंह को एक कार्यक्रम में बुलाया गया। ये दीगर बात है कि कार्यक्रम का मकसद शैक्षणिक कम राजनीतिक ज्यादा था। भरी सभा में मुलायम सिंह ने मंच से ही कुलपति एसबी सिंह को नसीहत दी कि वे परिवार के मुखिया हैं और छात्र नेता परिवार के सदस्य...अगर परिवार का सदस्य कोई गलती करता है तो उसे घर से निकाला नहीं जाता बल्कि उसे समझा-बुझाकर मनाया जाता है। अब नेताजी इतना तो समझते ही होंगे कि बंदूकों के साये में रहने वाले इन बिगड़ैल छात्र नेताओं को समझाना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा था। मुलायम सिंह जी चाह रहे थे कि आपराधिक प्रवृत्ति के इन छात्र नेताओं को परिसर में खुली छूट मिली रहे और तथाकथित छात्रहित के लिए संघर्ष की बात करने वाले इन छात्र नेताओं को स्वच्छंद छोड़ दिया जाए...भले ही उसके कारण आम छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान ही क्यों न पड़े ।
अब अमर सिंह की बात न हो ऐसा हो नहीं सकता कार्यक्रम के दौरान ही छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष अभिषेक सिंह आशू ने खुद को अमर सिंह से कुछ इस तरह जोड़ने की कोशिश की। आशू ने मंच से ही गुहार लगाई कि वे आजमगढ़ के हैं और अमर सिंह उनका नाम नहीं भूलते होंगे क्योंकि उनके परम मित्र अमिताभ बच्चन के पुत्र का नाम भी अभिषेक है। इस तरह लच्छेदार बातें करते हुए..अभिषेक सिंह आशू ने विवि परिसर में छात्रों की भूख को शांत करने के लिए एक कैंटीन बनवाने की मांग रखी और बातों बातों में अमर सिंह से दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता मांगी। अब अमर सिंह तो ठहरे अमर सिंह वो कहां इस गोल्डेन चांस को चूकने वाले थे। माइक थामते ही अमर सिंह ने मंच पर ही आशू को दो की बजाय चार लाख का चेक थमा दिया अब उस चार लाख का क्या हुआ ये सवाल ही पूछना शायद अपने आप में ही बेमानी होगा।
वापस लौटते हैं एलबीएस हॉस्टल की ओर...छात्र राजनीति को क़रीब से देखना हो तो आपको छात्रावासों के ताने-बाने को भी कायदे से समझना होगा। कैंपस में मेरा भी पहला साल था लिहाजा मैं भी छात्रसंघ चुनाव की तमाम रणनीतियों से परिचित होना चाह रहा था। उन्हीं दिनों एलबीएस हॉस्टल में एक नई परंपरा देखी...ये परंपरा थी भोजशालाओं की ये उस तरह की भोजशाला नहीं थी जिसकी स्थापना धार के राजा भोज ने ११वीं शताब्दी में की थी..ये वो भोजशाला भी नहीं थी जिसकी स्थापना कैटरीना से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए अमेरिका के सिख समुदाय ने की थी...ये लखनऊ विवि के छात्र नेताओं द्वारा स्थापित नई भोजशाला थी जिसका मकसद भी सांस्कृतिक या सामाजिक न होकर विशुद्ध रूप से राजनैतिक था।
कमोवेश हर छात्रावास में ऐसी भोजशाला स्थापित की गई थी..अंतःवासी छात्र भी इस भोजशाला का पूरा लाभ उठा रहे थे...भोजशाला में भी अलग-अलग तरह के पकवान बन रहे थे...कहीं पूड़ी सब्जी और खीर बन रही थी तो कहीं चिकन करी और तंदूरी रोटी का पूरा इंतजाम था..हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को एक महीने के लिए चूल्हा-चौके से फुरसत मिली हुई थी। कभी हालचाल न लेने वाले छात्र नेता इस चुनावी मौसम में अपने टारगेट वोटर पर पूरी तरह मेहरबान थे। छात्रों को चमचमाती गाड़ियों में घूमने का शौक पूरा करने का भी मौका मिल रहा था। कोई लैंडक्रूजर पर बैठने की हसरत पूरी कर रहा था तो किसी का सीना होंडा सीआरवी पर बैठकर चौड़ा हो रहा था...मतलब कि छात्रसंघ की राजनीति का ग्लैमर पूरी तरह से शबाब पर था ।
हर छात्र नेता की अपनी अपनी भोजशाला थी कोई भी छात्र किसी भी भोजशाला में बेरोक-टोक आ-जा सकता था। भोजशाला बदलने के साथ ही मुंह का स्वाद बदल रहा था...और अपने अपने छात्र नेता के प्रति निष्ठाएं भी बदल रही थीं...घात...प्रतिघात और भितरघात में भोजशालाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही थीं...जिस छात्र नेता की भोजशाला में बढ़िया भोजन मिल रहा था...वहां छात्रों की भीड़ भी इकट्ठा हो रही थी...छात्र नेता की भोजशाला में जुटने वाला मजमा एक तरीके से उसके वोट बैंक का प्रतीक था...भोजशाला में लंच और डिनर के दौरान प्रतिद्वंदी छात्र नेता के वोट बैंक में सेंध लगाने का हर मुमकिन प्रयास किया जाता था। इसके लिए जरूरी था मेन्यू में लजीज पकवानों को शामिल करना।
ऐसी ही एक भोजशाला परिसर के चंद्रशेखर आजाद छात्रावास (बटलर हॉस्टल) में भी स्थापित की गई थी...एक प्रतिद्वंदी छात्र नेता के गुट ने दूसरे छात्र नेता की भोजशाला का तंबू-कनात उखाड़ दिया। दूसरे गुट को ये हरकत नागवार गुजरी और मामले ने हिंसक रूप ले लिया। देखते ही देखते छात्र नेताओं के समर्थकों की बंदूकें गरजने लगीं और भोजशाला छात्र नेताओं के खूनी संघर्ष का अखाड़ा बन गई...गोलीबारी में जख्मी हॉस्टल के एक छात्र की किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में मौत हो गई। इसके बाद तो हालात काबू से बाहर हो गए...पहले तो छात्रों ने हॉस्टल में जमकर तोड़फोड़ और आगजनी की...इसके बाद विवि परिसर में स्थित पुलिस चौकी को फूंक दिया गया...मौके पर पहुंचे आला अधिकारियों के साथ जमकर गाली-गलौज की गई...छात्र संघ चुनाव के लिए नामांकन स्थगित कर दिया गया...परिसर अनिश्चितकाल के लिए बंद हो चुका था।
चुनावी भोजशाला की बलिवेदी पर एक निर्दोष छात्र के प्राण जा चुके थे...लखनऊ विवि का ये सहमा -सहमा मंजर मेरे लिए एक सपने के टूटने जैसा था। कुछ दिनों बाद कैंपस फिर खुल गया और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार के रहते लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव न हो ऐसा असंभव था। सो चुनाव प्रचार फिर शुरू हो गया और खुल गईं भोजशालाएं...पूरे लखनऊ विवि परिसर में अब इस तरह के नारे तीर की तरह चुभ रहे थे-
लइया चुरुरमुरुरिया, भइयक लाल चुनरिया....
भइया फिलिम देखइहैं, भइया नकल करइहैं...
भइया बम चलइहैं, भइया इलेक्शन लड़िहैं...
भइया जीत जइहैं, लइया चुरुरमुरुरिया ।
मैंने दोबारा कैंपस आना शुरू कर दिया था..हालांकि मन में डर भी बना रहता था। एक दिन जब मैं प्रॉक्टर ऑफिस के पास से गुजर रहा था तो दो अंतःवासियों को बात करते सुना कि इस बार छात्र संघ चुनाव में एक विकेट गिर चुका है...दो-तीन विकेट और गिर सकते हैं...तो दूसरा छात्र जवाब देता है कि हर बार तो चार-पांच विकेट गिरा करते थे...इस लिहाज से इस बार लगता है कि कम विकेट गिरेंगे। मैं भी चुपचाप बगलें झांकता हुआ अपने डिपार्टमेंट की ओर बढ़ चला।
सुधाकर सिंह
2 नवंबर, 2008
संप्रति- टीवी पत्रकार